Tale Poetry's Open Mic



मुझे खुद से नहीं, तुझसे आज़ाद किया जाए,
वो खामोशियां ढूंढ ले, वो सन्नाटे खोज ले,
कुछ बेचेनिया जगा दे, कुछ रिश्ते जला दे,
क्यों ना आज उनको बुझा दिया जाए,
चल आज,
मुझे खुद से नहीं, तुझसे आज़ाद किया जाए। 

जो अल्फ़ाज़ थम से गए, जो निगाहें झुक सी गई,
जो आंसू सुख से गए, और दिल उलझ सा गया,
क्यों ना उनको सुलझा लिया जाए,
चल आज,
मुझे खुद से नहीं, तुझसे आज़ाद किया जाए। 

किस्से कहानियों सा इश्क़ था, रुतबा मैने भी तेरा रखा था,
ख्वाहिशों का सितारा को चुना था, सपनों में सिर्फ तुमको बुना था,
ना कड़वी कहूं, ना मीठी, 
क्यों ना उन यादों को मिटा दिया जाए, 
मुझे खुद से नहीं, तुझसे आज़ाद किया जाए। 

तेरा देर से आना मंज़ूर था, तेरा गुस्सा होना कुबूल था,
वो कैफे का सोफ़ा जैसे घर था, जहापे तूने दिल चुराया था,
ना चाय का था ना कोफी सा
क्यों ना इस चस्के को छोड़ दिया जाए,
मुझे खुद से नहीं, तुझसे आज़ाद किया जाए। 

वो पहेली नजर सा इश्क़ था, जो मेरे से भी ज़्यादा ज़िद्दी था,
वो सूखा गुलाब सा तेरा प्यार था, जो बरसों बाद भी बेरंग था,
महोबात की कोरी किताब में लिखा मैने सिर्फ तेरा नाम था,
क्यों ना उस किताब को नई पर कागज को मिटा दिया जाए
मुझे खुद से नहीं, तुझसे आज़ाद किया जाए। 

में सोचू तू था, पर मुजमे नहीं था,
मैने जाना तू ख़्वाब देके, खाली सा कर गया था,
मैने देखा तू खुदको सुलझा के, उलझने दे गया था,
मेरा होना तू मुझसे छीन गया था,
क्यों ना उसको परखा जाए।
मुझे खुद से नहीं, तुझसे आज़ाद किया जाए। 

तेरा आखिरी लब्ज याद है, तेरा वो मुड जाना याद है,
तेरी बेरुखी केसे भूलू, तेरा अखिरमे गले मिलना याद है,
तेरी वो तीखी बाते, उफ्फ तेरे वो मासूम झगडे याद है,
क्यों ना उनको कभी ना जिया जाए,
मुझे खुद से नहीं, तुझसे आज़ाद किया जाए।

अगर फिर तू ज़लक दिखाए, में रूठी सी पेश आऊं,
अगर फिर तू नजदीक आए, तो में फासले बढ़ाऊ,
अगर फिरसे तूने चुप्पी तोड़ी, तो सुनके भी अनसुना कर जाऊं,
अगर तुजे लगती ये बेईमानी है, तो में तेरे लिए बेईमान बन जाऊं,
क्यों ना इसी बेहरेमी से जुड़ जाऊं, 
मुझे खुद से नहीं, तुझसे आज़ाद कर जाऊं। 

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